विषय:- उपवास।

यशायाह 58:6-7
जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूं, वह क्या यह नहीं, कि, अन्याय से बनाए हुए दासों, और अन्धेर सहने वालों का जुआ तोड़कर उन को छुड़ा लेना, और, सब जुओं को टूकड़े टूकड़े कर देना? 
क्या वह यह नहीं है कि अपनी रोटी भूखों को बांट देना, अनाथ और मारे मारे फिरते हुओं को अपने घर ले आना, किसी को नंगा देखकर वस्त्र पहिनाना, और अपने जातिभाइयों से अपने को न छिपाना?

उपवास एक ऐसा कार्य है जिसको करने से हम परमेश्वर के और अधिक समीप पहुँच सकते हैं। हम सभी उपवास रखते हैं।
वचन कहता हैं कि जो उपवास परमेश्वर को पसंद हैं वह यह हैं कि उन लोगो के लिए प्रेम और चिंता हो जो कि सताए हुए हैं। जिनके जीवन मे परेशानी हो और वह एक बोझ को ढो रहे हो। जो लोग भूखे हैं। जिनके पास रहने को घर नही हैं। पहनने को कपड़े नही हैं।

प्रत्येक विश्वासी को यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि वह दशमांश और दान देकर इस कार्य से मुक्त नही हो जाता क्योकि उन्हें परमेश्वर को उत्तर देना होगा। जैसे हम अपने घर के प्रत्येक कार्य के लिए जवाबदेह हैं उसी तरह से मसीह समाज को इस कार्य के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।

पद 7 में एक और बात को लिखा है कि अपने जातिभाइयों से अपने को न छिपाना।
यह विषय सबसे महत्वपूर्ण हैं कि हम जब किसी से भी मिले तो अपने आप को ना छिपाए यानी हम इस बात का अंगीकार करे कि हम मसीह हैं। और जब हम अंगीकार करेंगे तो हमारे जीवन से बहुत सारे बन्धन टूट जाएंगे और हम उन आशीषों को प्राप्त करेंगे जिनके विषय में हमने सोचा भी नही होगा।

पद 6 और 7 को जब हम अपने जीवन मे पूरा करेंगे तो वचन 8 और9 के अनुसार हमारे जीवन मे आशीष आएंगी। हमारे जीवन मे आनन्द, चंगाई, परमेश्वर की सुरक्षा, उसकी उपस्थिति, परमेश्वर की अगुवाई पायी जाएगी। जब हम उसे पुकारेंगे तो वह हमारी सुनेगा।

परमेश्वर आप सभी को आशीष करे।
सभी को जय मसीह की

Samanta AG Church
बलजीत नगर पटेल नगर
नई दिल्ली इंडिया।

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